घुटने के प्रत्यारोपण के बाद होने वाली मालिश एक अत्यंत विशेषज्ञता वाला चिकित्सीय हस्तक्षेप है, जिसके साथ अत्यधिक सावधानी बरतना आवश्यक है तथा आमतौर पर इसे पेशेवर मार्गदर्शन में ही किया जाना चाहिए। इसके प्राथमिक उद्देश्य दर्द का प्रबंधन करना, घुटने में होने वाली महत्वपूर्ण सूजन (एडीमा) को कम करना, निशान (स्कार टिशू) के आसपास ऊतकों के आपस में जुड़ने (एडहेशन) को रोकना तथा नए जोड़ की सुरक्षा को नुकसान पहुँचाए बिना धीरे-धीरे गति की सीमा को बहाल करना होता है। इसकी तकनीकें अत्यंत कोमल होती हैं तथा इनका ध्यान मुख्य रूप से घुटने के आसपास की मांसपेशियों, जैसे कि क्वाड्राइसेप्स और हैमस्ट्रिंग्स, पर केंद्रित होता है, विशेषकर शुरुआती चरणों में इसका ध्यान ऑपरेशन के दौरान हुई काट (इंसिज़न साइट) पर नहीं होता। अतिरिक्त तरल पदार्थ को हटाने और सूजन को कम करने के लिए अक्सर मैनुअल लिम्फैटिक ड्रेनेज (एमएलडी) तकनीकों का उपयोग किया जाता है। यह सावधानीपूर्वक की गई मालिश रक्त परिसंचरण में सुधार करने, मांसपेशी में ऐंठन को कम करने तथा मांसपेशियों के अपघटन (एट्रॉफी) को रोकने में मदद करती है, जो सफल पुनर्वास परिणाम के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह बिल्कुल आवश्यक है कि इसे केवल तभी किया जाए जब शल्य चिकित्सक या शारीरिक चिकित्सक द्वारा स्पष्ट अनुमति दी गई हो, क्योंकि गलत समय पर या अत्यधिक दबाव से उपचार की प्रक्रिया में बाधा आ सकती है। यह प्रक्रिया गतिशीलता के सुचारु तथा संभावित रूप से तेज़ी से लौटने में सहायता करने वाली एक व्यापक स्वास्थ्य बहाली योजना का एक महत्वपूर्ण घटक है।